पलायन वाले पहाड़ के गांव से राष्ट्रपति भवन तक: आज भगत सिंह कोश्यारी को मिलेगा पद्म भूषण
उत्तराखंड की राजनीति में यदि उन नेताओं के नाम गिनाए जाएं जिन्होंने संगठन, विचारधारा, आंदोलन और सत्ता—चारों स्तरों पर अपनी अलग पहचान बनाई, तो भगत सिंह कोश्यारी का नाम उनमें प्रमुखता से लिया जाएगा। बागेश्वर जिले के एक छोटे से पहाड़ी गांव से निकलकर मुख्यमंत्री, सांसद, राज्यपाल और राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचने वाले “भगत दा” को आज देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान “पद्म भूषण” से सम्मानित किया जाएगा।
आज राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष समारोह में राष्ट्रपति द्वारा उन्हें यह सम्मान सार्वजनिक जीवन और राजनीति में लंबे योगदान के लिए प्रदान किया जाएगा। इस सम्मान की घोषणा केंद्र सरकार ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर की थी।
यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उत्तराखंड की उस राजनीतिक पीढ़ी की पहचान के रूप में भी देखा जा रहा है जिसने राज्य आंदोलन, पहाड़ की समस्याओं और वैचारिक राजनीति को लंबे समय तक जीवित रखा।
साधारण परिवार, पहाड़ का संघर्ष और शिक्षा से शुरुआत
17 जून 1942 को बागेश्वर जिले के पालनाधूरा गांव में जन्मे भगत सिंह कोश्यारी का जीवन पहाड़ की कठिन परिस्थितियों के बीच शुरू हुआ। उस दौर में गांवों में सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं बेहद सीमित थीं। पहाड़ से पलायन, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी आम समस्या थी।
ऐसे माहौल में पढ़ाई पूरी कर उन्होंने अंग्रेजी विषय में परास्नातक किया और कुछ समय तक शिक्षक के रूप में कार्य किया। कहा जाता है कि शुरुआती दौर से ही उनमें सामाजिक और वैचारिक मुद्दों को लेकर गहरी रुचि थी। बाद में उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी कदम रखा और “परवत पीयूष” जैसे प्रकाशन से जुड़े।
उनकी लेखनी में पहाड़, राष्ट्रवाद और सामाजिक सरोकार प्रमुख विषय माने जाते रहे।
RSS, आपातकाल और वैचारिक राजनीति
भगत सिंह कोश्यारी लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े रहे। संगठनात्मक जीवन ने उनकी राजनीतिक सोच और कार्यशैली को गहराई से प्रभावित किया।
आपातकाल के दौरान वे मीसा (MISA) के तहत जेल भी गए। भाजपा और उससे पहले जनसंघ की राजनीति में उस दौर के कई नेताओं की तरह उनका राजनीतिक जीवन भी संघर्ष और वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ा।
उत्तराखंड के कई भाजपा कार्यकर्ता आज भी उन्हें “संगठन का आदमी” मानते हैं—ऐसा नेता जो कार्यकर्ताओं के बीच से निकलकर शीर्ष पदों तक पहुंचा।
उत्तराखंड आंदोलन और राज्य निर्माण की राजनीति
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के समय पहाड़ में अलग राज्य की मांग तेज हो रही थी। बेरोजगारी, पलायन, पर्वतीय उपेक्षा और प्रशासनिक दूरी बड़े मुद्दे थे।
उस दौर में भाजपा और राज्य आंदोलन से जुड़े नेताओं में भगत सिंह कोश्यारी की भूमिका लगातार मजबूत होती गई। राज्य गठन के बाद बनी पहली सरकारों में उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलीं।
ऊर्जा, सिंचाई, संसदीय कार्य जैसे विभाग संभालते हुए उन्होंने प्रशासनिक अनुभव हासिल किया। बाद में वर्ष 2001 में उन्हें उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनाया गया।
हालांकि उनका मुख्यमंत्री कार्यकाल लंबा नहीं रहा, लेकिन भाजपा संगठन और उत्तराखंड की राजनीति में उनकी पकड़ लगातार बनी रही।
विधायक, सांसद और दिल्ली तक प्रभाव
भगत सिंह कोश्यारी कपकोट विधानसभा क्षेत्र से कई बार विधायक रहे। वे उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी बने।
इसके बाद वे राज्यसभा पहुंचे और राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 2014 में नैनीताल-उधमसिंह नगर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए।
दिल्ली की राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने अक्सर पहाड़, सैनिक पृष्ठभूमि, पलायन और पर्वतीय विकास जैसे मुद्दों को उठाया।
महाराष्ट्र राजभवन और राष्ट्रीय विवाद
साल 2019 में उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त किया गया। इसके बाद उनका राजनीतिक जीवन राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक चर्चा में आया।
महाराष्ट्र में सरकार गठन के घटनाक्रम से लेकर कई राजनीतिक विवादों तक उनका नाम लगातार सुर्खियों में रहा। शिवाजी महाराज, मुंबई और मराठी अस्मिता को लेकर दिए गए कुछ बयानों पर विपक्ष ने तीखा विरोध भी किया।
महाराष्ट्र में उनके खिलाफ प्रदर्शन हुए और कई बार उनके इस्तीफे की मांग भी उठी।
हालांकि समर्थकों का कहना रहा कि भगत सिंह कोश्यारी हमेशा स्पष्टवादी रहे और उन्होंने कभी राजनीतिक बयान देने से परहेज नहीं किया।
“भगत दा” की छवि क्यों अलग मानी जाती है?
उत्तराखंड भाजपा के भीतर भगत सिंह कोश्यारी को केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि संगठनकर्ता और वैचारिक नेता के रूप में भी देखा जाता है।
वे साधारण जीवनशैली, पहाड़ी बोली और कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद के लिए पहचाने जाते रहे। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद कई विरोधी नेता भी उन्हें व्यक्तिगत रूप से सरल स्वभाव का बताते रहे हैं।
उत्तराखंड की राजनीति में उनकी पहचान “भगत दा” के रूप में बनी—एक ऐसे नेता की, जिसने गांव से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंच बनाई लेकिन पहाड़ी जड़ों से जुड़ा रहा।
उत्तराखंड में क्यों खास माना जा रहा यह सम्मान?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उत्तराखंड की राजनीतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है।
एक ऐसे राज्य से, जहां लंबे समय तक पलायन, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी सबसे बड़े मुद्दे रहे, वहां से निकलकर किसी नेता का राष्ट्रपति भवन में पद्म भूषण सम्मान प्राप्त करना स्थानीय लोगों के लिए भावनात्मक विषय भी बन जाता है।
कुमाऊं क्षेत्र विशेषकर बागेश्वर और कपकोट में भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच इसे लेकर उत्साह देखा जा रहा है। कई लोग इसे “पहाड़ के सम्मान” के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं।
राजनीतिक विरासत पर भी होगी चर्चा
भगत सिंह कोश्यारी को पद्म भूषण मिलने के साथ ही एक बार फिर उत्तराखंड की पुरानी राजनीतिक पीढ़ी, राज्य आंदोलन की राजनीति और भाजपा के संगठनात्मक इतिहास पर चर्चा तेज हो सकती है।
क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति में आज भी वे उन नेताओं में गिने जाते हैं जिन्होंने आंदोलन, संगठन, सत्ता और राष्ट्रीय राजनीति—सभी स्तरों पर सक्रिय भूमिका निभाई।
बागेश्वर के एक छोटे से गांव से राष्ट्रपति भवन तक का यह सफर आज केवल एक सम्मान समारोह नहीं, बल्कि पहाड़ की राजनीति की एक लंबी कहानी भी बन गया है।
