टिहरी की कालकोठरी में बुझा एक दीपक, लेकिन जाग उठा पूरा पहाड़: श्रीदेव सुमन की जयंती पर विशेष
उत्तराखंड की धरती केवल प्राकृतिक सुंदरता, हिमालय और नदियों की भूमि नहीं रही, बल्कि यह संघर्ष, त्याग और जनआंदोलनों की भी भूमि रही है। इसी धरती ने एक ऐसा युवा भी देखा जिसने सत्ता के सामने झुकने के बजाय अपने प्राणों का बलिदान देना स्वीकार किया। वह युवा था — Sri Dev Suman।
25 मई को जब उत्तराखंड में श्रीदेव सुमन की जयंती मनाई जाती है, तो यह केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं होती, बल्कि पहाड़ की उस चेतना को याद करने का अवसर होता है जिसने अन्याय और दमन के खिलाफ आवाज उठाने का साहस किया। आज भी जब टिहरी, गढ़वाल या पूरे उत्तराखंड की बात होती है, तो श्रीदेव सुमन का नाम केवल इतिहास के पन्नों में नहीं, बल्कि लोगों की भावनाओं और संघर्षों में जीवित दिखाई देता है।
साल 1916 में टिहरी गढ़वाल के जौल गांव में जन्मे श्रीदेव सुमन का वास्तविक नाम श्रीदत्त बडोनी था। उनका जीवन शुरू से ही संघर्षों से भरा रहा। कम उम्र में पिता का साया उठ गया, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें कमजोर नहीं किया। शिक्षा के दौरान ही उनके भीतर सामाजिक चेतना विकसित होने लगी। देश उस समय अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन की आग में जल रहा था, लेकिन टिहरी रियासत की स्थिति अलग थी। यहां जनता केवल अंग्रेजी प्रभाव ही नहीं, बल्कि राजशाही के दमन का भी सामना कर रही थी।
टिहरी रियासत में जनता के अधिकार सीमित थे। विरोध की आवाज को दबा दिया जाता था, बेगार जैसी प्रथाएं आम थीं और शासन के खिलाफ बोलना अपराध माना जाता था। ऐसे माहौल में श्रीदेव सुमन ने जनता की आवाज बनने का निर्णय लिया। वे गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित थे। उन्होंने हिंसा के बजाय सत्याग्रह और जनजागरण का रास्ता चुना। गांव-गांव जाकर लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना, लेख लिखना और युवाओं को संगठित करना उनके आंदोलन का हिस्सा बन गया।
धीरे-धीरे टिहरी राजशाही को यह महसूस होने लगा कि यह युवा केवल भाषण देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जनता के भीतर एक नई चेतना पैदा कर रहा है। यही कारण था कि उन पर निगरानी बढ़ा दी गई। लेकिन सुमन पीछे हटने वालों में नहीं थे। उन्होंने “टिहरी राज्य प्रजा मंडल” के माध्यम से लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को और मजबूत किया। वे चाहते थे कि जनता को बोलने का अधिकार मिले, शोषण खत्म हो और टिहरी की जनता भी स्वतंत्र भारत के सपनों में शामिल हो सके।
राजशाही के लिए यह आवाज असहज थी। आखिरकार उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद जो हुआ, वह केवल एक व्यक्ति पर अत्याचार नहीं था, बल्कि उस दौर की दमनकारी व्यवस्था का प्रतीक बन गया। जेल में उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। कहा जाता है कि उन्हें जंजीरों में बांधकर रखा गया, भोजन तक में अपमान झलकता था, लेकिन उनका मनोबल टूट नहीं पाया।
फिर आया वह ऐतिहासिक क्षण जिसने श्रीदेव सुमन को केवल एक आंदोलनकारी नहीं, बल्कि अमर बलिदानी बना दिया।
उन्होंने जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया।
यह अनशन किसी व्यक्तिगत सुविधा के लिए नहीं था। यह जनता के अधिकारों, सम्मान और न्याय की लड़ाई थी। दिन गुजरते गए। शरीर कमजोर होता गया, लेकिन संकल्प और मजबूत होता गया। 10 दिन, 20 दिन, 40 दिन… और फिर 84 दिन।
84 दिनों तक भूखे रहकर संघर्ष करना केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि आत्मबल और विचारों की ऐसी शक्ति थी जिसने पूरी टिहरी रियासत को हिला दिया। आखिरकार 25 जुलाई 1944 को उनका शरीर जवाब दे गया। लेकिन उनकी मृत्यु भी राजशाही के डर को खत्म नहीं कर सकी। बताया जाता है कि जनता के आक्रोश से बचने के लिए उनके शव को भिलंगना नदी में बहा दिया गया। शायद शासन यह सोच रहा था कि एक शरीर के समाप्त होने से आवाज भी खत्म हो जाएगी, लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा।
श्रीदेव सुमन की शहादत पहाड़ की आत्मा में बस गई।
उनके बलिदान ने आने वाले वर्षों में टिहरी राजशाही के खिलाफ जनआंदोलन को और तेज कर दिया। यही चेतना आगे चलकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन तक पहुंची। इसलिए कई लोग उन्हें “उत्तराखंड का भगत सिंह” भी कहते हैं। फर्क केवल इतना था कि एक ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी थी और दूसरे ने पहाड़ की राजशाही को।
आज जब उत्तराखंड अपनी पहचान, पलायन, बेरोजगारी, संसाधनों और अधिकारों को लेकर लगातार बहस कर रहा है, तब श्रीदेव सुमन का जीवन और भी प्रासंगिक दिखाई देता है। उनका संघर्ष यह संदेश देता है कि किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी जागरूक जनता होती है। सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि जनता अपने अधिकारों के लिए खड़ी हो जाए तो बदलाव निश्चित है।
विडंबना यह भी है कि जिन आदर्शों के लिए श्रीदेव सुमन ने अपना जीवन दिया, आज उन्हीं मुद्दों पर उत्तराखंड बार-बार सवालों के घेरे में दिखाई देता है। पहाड़ आज भी पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में श्रीदेव सुमन केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए भी एक चेतावनी और प्रेरणा दोनों हैं।
उनकी जयंती पर केवल माल्यार्पण कर देना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड की नई पीढ़ी यह समझे कि लोकतंत्र और अधिकार किसी सरकार की कृपा से नहीं, बल्कि संघर्ष और बलिदान से हासिल होते हैं।
टिहरी की उस जेल में भले ही एक युवा का शरीर कमजोर पड़ गया था, लेकिन उसी कालकोठरी से एक ऐसी आवाज निकली जिसने पूरे पहाड़ को जगा दिया।
