नहीं काम आया आंदोलन, आखिरकार बिक ही गई कंपनी: रामनगर के मोहान स्थित IMPCL अब निजी हाथों में

रामनगर/देहरादून। उत्तराखंड के रामनगर स्थित मोहन क्षेत्र में वर्षों से संचालित भारतीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी दवाओं के सरकारी उपक्रम IMPCL (Indian Medicines Pharmaceutical Corporation Limited) को आखिरकार केंद्र सरकार ने निजी कंपनी को बेचने की मंजूरी दे दी है। लंबे समय से चल रहे विरोध, धरना-प्रदर्शन, ज्ञापन, राजनीतिक बयानबाज़ी और स्थानीय लोगों की भावनात्मक अपीलों के बावजूद अब यह सरकारी कंपनी निजी हाथों में चली गई है। केंद्र सरकार ने दिल्ली आधारित कंपनी Skymap Pharmaceuticals Pvt. Ltd. की ₹121 करोड़ की बोली को मंजूरी दे दी है।

मोहन क्षेत्र में स्थित IMPCL केवल एक कंपनी नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की रोज़ी-रोटी और पूरे इलाके की अर्थव्यवस्था का आधार मानी जाती रही है। वर्ष 1978 में स्थापित यह कंपनी आयुष मंत्रालय के अधीन कार्यरत थी और आयुर्वेदिक तथा यूनानी दवाओं के निर्माण और आपूर्ति का कार्य करती थी।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कई वर्षों से इस कंपनी को बचाने के लिए लगातार संघर्ष किया गया। कर्मचारियों, स्थानीय व्यापारियों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने केंद्र सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की थी। प्रधानमंत्री को पत्र लिखे गए, भाजपा सांसद अनिल बलूनी से हस्तक्षेप की अपील हुई, विपक्षी दलों ने सड़कों पर उतरकर आंदोलन किया और कांग्रेस नेता राहुल गांधी तक भी यह मुद्दा पहुंचाया गया। लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद अंत में वही हुआ जिसकी आशंका लंबे समय से जताई जा रही थी।
सरकार की ओर से जारी जानकारी के अनुसार IMPCL की रणनीतिक बिक्री प्रक्रिया कई वर्षों से चल रही थी। केंद्र सरकार ने 2017 में ही कंपनी के विनिवेश को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी थी। इसके बाद 2023 में इच्छुक कंपनियों से आवेदन मांगे गए और अंततः दो कंपनियों ने वित्तीय बोली लगाई। इनमें Skymap Pharmaceuticals सबसे बड़ी बोलीदाता बनकर सामने आई।

अब इस फैसले के बाद सबसे बड़ी चिंता रोजगार को लेकर सामने आ रही है। स्थानीय लोगों और कर्मचारियों के बीच आशंका है कि निजीकरण के बाद बड़ी संख्या में कर्मचारियों पर बेरोजगारी का खतरा मंडरा सकता है। मोहन और आसपास के क्षेत्रों में वर्षों से इस कंपनी पर निर्भर परिवारों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। लोगों का कहना है कि सरकारी उपक्रम होने के कारण यहां रोजगार की एक स्थिर व्यवस्था थी, लेकिन निजी हाथों में जाने के बाद लाभ और लागत के आधार पर फैसले लिए जाएंगे।
विरोध करने वाले संगठनों का आरोप है कि सरकार ने जनभावनाओं की अनदेखी की है। उनका कहना है कि आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा से जुड़ी इतनी महत्वपूर्ण सरकारी इकाई को मजबूत करने के बजाय बेच देना उत्तराखंड के हितों के खिलाफ है। कई लोगों ने इसे “पहाड़ से एक और सरकारी सहारे के खत्म होने” के रूप में भी देखा है।

दूसरी ओर का कहना है कि यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और प्रतिस्पर्धात्मक तरीके से पूरी की गई है तथा इससे कंपनी की कार्यक्षमता और निवेश क्षमता बढ़ेगी। वित्त मंत्रालय के अनुसार Skymap Pharmaceuticals की ₹121 करोड़ से अधिक की बोली रिजर्व प्राइस से भी ऊपर थी और सभी प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद ही बिक्री को मंजूरी दी गई।

अब मोहन और पूरे रामनगर क्षेत्र में यही चर्चा है कि क्या निजीकरण के बाद कंपनी पहले की तरह चलेगी, कर्मचारियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा या फिर यह फैसला इलाके के लिए बड़े आर्थिक और सामाजिक बदलाव की शुरुआत साबित होगा। फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि लंबे संघर्ष और विरोध के बावजूद IMPCL अब इतिहास के एक नए अध्याय में प्रवेश कर चुकी है।

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