मानकों से समझौता या किसानों के साथ अन्याय? उत्तराखंड में बन रहे पॉलीहाउसों पर उठे सवाल
देहरादून। उत्तराखंड सरकार द्वारा किसानों की आय बढ़ाने और बेमौसमी सब्जी एवं फूल उत्पादन को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से शुरू की गई पॉलीहाउस योजना अब सवालों के घेरे में आती दिखाई दे रही है। कई किसानों ने आरोप लगाया है कि प्रदेश में बनाए जा रहे पॉलीहाउस निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं हैं, जिससे योजना की गुणवत्ता और दीर्घकालिक उपयोगिता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
कृषि एवं उद्यान विशेषज्ञ डॉ. राजेंद्र कुकसाल ने भी इस विषय को प्रमुखता से उठाते हुए कहा है कि यदि पॉलीहाउसों का निर्माण निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हुआ, तो करोड़ों रुपये की यह महत्वाकांक्षी योजना किसानों के लिए लाभ के बजाय परेशानी का कारण बन सकती है।
दरअसल, उत्तराखंड सरकार राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के सहयोग से प्रदेश में लगभग 14,777 छोटे-बड़े पॉलीहाउस स्थापित करने जा रही है। इस पूरी योजना पर लगभग 304 करोड़ रुपये खर्च किए जाने हैं। योजना के तहत किसानों को पॉलीहाउस निर्माण पर 80 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है, जबकि शेष 20 प्रतिशत राशि किसान स्वयं वहन करेंगे।
सरकार की इस पहल को पर्वतीय कृषि के लिए बड़ा कदम माना जा रहा है, क्योंकि संरक्षित खेती (Protected Cultivation) तकनीक के माध्यम से प्रतिकूल मौसम में भी सब्जियों, फूलों और नर्सरी उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है। लेकिन अब किसानों का कहना है कि जमीन पर जो पॉलीहाउस बनाए जा रहे हैं, वे तकनीकी मानकों से मेल नहीं खा रहे।
कई किसानों का आरोप है कि उन्हें निर्माण संबंधी आधिकारिक मानकों की जानकारी तक उपलब्ध नहीं कराई जा रही। कुछ स्थानों पर पाइप की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो कहीं पॉलीहाउस की ऊंचाई और संरचना निर्धारित मापदंडों से कम बताई जा रही है। किसानों का कहना है कि यदि निर्माण गुणवत्ता कमजोर रही तो तेज हवा, बर्फबारी और भारी बारिश वाले पर्वतीय क्षेत्रों में पॉलीहाउस अधिक समय तक टिक नहीं पाएंगे।
डॉ. राजेंद्र कुकसाल के अनुसार RIDF योजना के अंतर्गत पॉलीहाउस निर्माण के कुछ प्रमुख मानक निर्धारित हैं, जिनमें पॉलीहाउस की केंद्र में ऊंचाई 4.5 मीटर और साइड में 3 मीटर होना, Class-A गुणवत्ता के पीली पट्टी वाले पाइपों का प्रयोग, ड्रिप सिंचाई प्रणाली, प्लास्टिक पानी टंकी, पानी की मोटर, दो गेट, अधिकतम 3 मीटर पोल दूरी, UV स्टैबलाइज्ड 200 माइक्रोन पॉलीथीन शीट तथा वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का प्रावधान शामिल है।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल पॉलीहाउस स्थापित कर देना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि किसानों को संरक्षित खेती की तकनीकी जानकारी, तापमान नियंत्रण, ड्रिप सिंचाई प्रबंधन और फसल चयन का प्रशिक्षण देना भी अनिवार्य है। अन्यथा कई पॉलीहाउस कुछ वर्षों बाद अनुपयोगी ढांचे बनकर रह जाएंगे।
उल्लेखनीय है कि पूर्व में इस योजना के तहत पॉलीहाउस निर्माण की जिम्मेदारी ब्रेथवेट संस्था को दी गई थी, लेकिन कार्य प्रगति धीमी रहने के कारण विभाग ने वह जिम्मेदारी वापस लेकर अब उद्यान विभाग के माध्यम से योजना का संचालन शुरू किया है।
अब देखना यह होगा कि सरकार और उद्यान विभाग किसानों की शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या वास्तव में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी या नहीं। क्योंकि यदि करोड़ों रुपये की यह योजना मानकों से समझौते की भेंट चढ़ी, तो इसका सीधा असर पहाड़ के उन किसानों पर पड़ेगा, जिनके लिए इसे आत्मनिर्भरता और आय बढ़ाने का माध्यम बताया जा रहा है।
